हम सब विकलांग हैं

3 December का दिन International Day of People with Disability (IDPwD) विकलांग लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

३ दिसम्बर २०१५ को मैं चंदौली जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी के ऑफिस में गया था। वहाँ पर Children With Special Needs (CWSN) चिल्ड्रेन विथ स्पेशल नीड्स बच्चों के लिए कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें बच्चों के लिए विभिन्न प्रतियोगिताएं जैसे कुर्सी दौड़, रस्सी खींच आदि आयोजित की गयी थीं।

ये बच्चे अलग-अलग प्रकार की शारीरिक अक्षमताओं के शिकार थे पर वे लगभग हर वो काम कर में सक्षम थे जो एक सामान्य बच्चा कर सकता है। जैसे की मूक और बधिर बच्चे आसानी से कम्यूनिकेट कर रहे थे। हालांकि मैं उनकी भाषा नहीं समझता पर वे बड़ी आसानी से आपस में और अपने शिक्षकों से बातें कर ले रहे थे।

हम सबने अपने बचपन में कुर्सी दौड़ खेला है। यह खेल कैसे खेला जाता है? इसमें एक गाना बजता है और बच्चे कुर्सियों के चारों ओर दौड़ते हैं। जैसे ही ये गाना बंद होता है बच्चे खाली कुर्सियों पर बैठ जाते हैं। अब क्योंकि कुर्सियों की संख्या बच्चों की संख्या से काम होती है इसलिए कुछ बच्चों को बैठने के लिए कुर्सियां नहीं मिलती और वे इस दौड़ से बहार हो जाते हैं।

अब यही खेल जब मूक एवं बधिर बच्चे खेल रहे थे तो क्योंकि वे सुन नहीं सकते इसलिए उनके लिए एक रूमाल लहराया जाता था, जैसे ही ये रूमाल लहराना बंद होता, बच्चे तुरंत कुर्सी की ओर दौड़ पड़ते।

इसी प्रकार हर विकलांग बच्चा किसी ना किसी प्रकार से लगभग सारे वे काम जो एक सामान्य बच्चा कर सकता है कर लेते हैं। जैसे अंधे बच्चे किताबें पढ़ लेते हैं, हालांकि वे इन्हें देखकर नहीं बल्कि छूकर पढ़ते हैं।

अब जरा सोचिये अगर कोई अँधा व्यक्ति ये सोच ले की मैं तो पढ़ ही नहीं सकता क्योंकि किताबों में लिखा मैं कैसे देखूंगा तो आप तो कहेंगे इसे कुछ नहीं मालूम। पर हम सब इसी प्रकार की किसी ना किसी कमी के शिकार हैं और बैठे- बैठे ये सोचते रहते हैं की काश ये कमी मुझमे ना होती तो मैं सारे काम कर लेता।

इस संसार में हर कोई किसी ना किसी प्रकार की दृश्य या अदृश्य विकलांगता का शिकार है। इसी प्रकार इस संसार में हर कोई किसी ना किसी प्रकार के दृश्य या अदृश्य वरदान का धारक है। हमें अपनी इन विकलांगताओं और वरदानों को पहचानना आना चाहिये।

हर काम को करने के कुछ जाने माने तरीके होते हैं और हम नए तरीकों के बारे में सोचते ही नहीं। यही हमारी विकलांगता है। क्योंकि हमने जो मान्यताएं बना ली हैं हम उनसे बंध जाते हैं और उन मान्यताओं को परखते नहीं। हम कोई नया रास्ता ढूँढते ही नहीं और हार मान लेते हैं।

हमें विकलांगताओं के दुष्प्रभावों को कम या समाप्त करने के उपाय ढूँढने चाहिए। और अपने वरदानों का फायदा उठाना चाहिए।

 

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