बूढ़ा बगुला और केकड़ा ज्ञानवर्धक कहानी

भरी गर्मी की तपती दोपहर में एक बूढ़ा बगुला तालाब के किनारे गर्दन झुकाए शांत भाव से खड़ा था। उसके इस शांत स्वाभाव को देखकर उसके मन में चल रहे भूचालों का अनुमान लगाना मुश्किल था।

जीवन में अलग-अलग फेज़ आते हैं। जब हम बच्चे होते हैं तो माँ-बाप हमारी देखभाल करते हैं, और जब हम जवान होते हैं तब हम अपनी बाजुओं की ताकत, उद्यमिता और बुद्धि से अपना जीवन यापन करते हैं। किन्तु जब बुढ़ापा आता है तब ना तो हमारे माँ-बाप ही होते हैं ना ही हमारी बाजुओं में इतनी ताकत होती है की हम अपना जीवन यापन कर सकें।

बुढ़ापे में दिन प्रतिदिन परिस्थितियाँ बद से बदतर होती जाती हैं। और हमारी सारी इन्द्रियाँ हमारा साथ छोड़ने लगती हैं। और एक ऐसा समय आता है जब हमारे लिए पेट भरना भी मुश्किल हो जाता है। फिर हमें उस अपरिहार्य दुश्मन की शक्ति का एहसास होता है जिससे हम हजारों बार भी जीत जायें पर एक हार ही सब कुछ ख़त्म कर देती है।

आज उस बूढ़े बगुले को अपनी मौत दिखाई दे रही थी। इसी तलब के किनारे कितने ठाठ से हँसी ख़ुशी उसका बचपन और जवानी बीती थी। इस तालाब में खाने लायक इतनी मछलियाँ, मेढक और अन्य जीव थे कि आज तक कभी भी उसने भूखा रहने का सपना भी नहीं देखा था।

लेकिन धीरे-धीरे समय बीतता गया और अब बुढ़ापे ने उसे आ घेरा था। एक-एक कर उसकी इन्द्रियाँ और अन्य अंग कमजोर होते चले गए और तालाब से मछलियाँ और मेंढक पकड़ना मुश्किल होता चला गया। आज उसके जीवन में पहली बार ऐसा हुआ था कि वो पिछले दो दिनों से भूखा था। और आगे भी भोजन मिलने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी।

लेकिन वह बूढ़ा बगुला हार मानने वालों में से नहीं था। वो अभी और जीना चाहता था और इसके लिए जो भी जरूरी हो और जो भी वह कर सकता था वो करने के लिए वह पूरी तरह से तैयार था। जीने के लिए उसे भोजन की आवश्यकता थी और आज भले ही उसके बल ने उसका साथ छोड़ना शुरू कर दिया था परन्तु उसकी बुद्धि आज भी उसके साथ थी। और जो काम बल से ना हो सके उसके लिए बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए ऐसा सोचकर वह बूढ़ा बगुला आज बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्ण और कुटिल योजना के तहत वहाँ खड़ा हुआ था।

तालाब के किनारे गर्दन झुकाए शांत भाव से खड़े बूढ़े बगुले ने बीच-बीच में जोर-जोर से विलाप करना शुरू किया। “हे भगवान इस तलब के जीवों को सद्बुधि दे, और इन्हें महा प्रलय से बचा”।

बगुले का ऐसा विलाप सुनकर तालाब में रहने वाले एक केकड़े ने सोचा जिस बगुले को इस समय मछलियाँ और मेंढक पकड़ने चाहिए वो ऐसी अवस्था में विरक्त होकर विलाप कर रहा है जरूर कोई बात होगी। मुझे इसका पता लगाना चाहिए।

ऐसा सोचकर केकड़ा बूढ़े बगुले के पास गया और पूछा बगुला मामा जब आपको अपनी पेट पूजा करनी चाहिए ऐसे समय में आप यहाँ खड़े होकर विलाप क्यों कर रहे हैं?

इसपर बगुले ने कहा भांजे मुझे जो जानकारी मिली है उसके बाद तो मेरी भूख-प्यास ही मर गयी है। मेरा क्या है मैं तो बूढ़ा हो चुका हूँ। और वैसे भी जल्दी ही मरने वाला हूँ। पर मुझे तो तुम लोगों की चिंता हो रही है, जो जवानी में ही काल के गर्त में सामने वाले हैं।

बगुले की ऐसी बातें सुनकर केकड़ा घबरा गया। “ऐसी के बात हो गयी?” उसने पूछा।

बूढ़े बगुले ने कहा मुझे एक ज्योतिषि ने बताया है कि गृह नक्षत्रों का ऐसा मनहूस योग बना है कि अगले १२ वर्षों तक यहाँ बारिश नहीं होगी। और यह तालाब तो अभी से सूख रहा है देखो जहाँ पानी भरा रहता था वो जमीन आज धुप से तप रही है और ऐसी फट गयी है जैसे सबको निगल ही लेगी।

अब बारिश तो होने से रही और यह तालाब १२ वर्ष तो क्या १२ दिन में ही सूख जाने वाला है। तब सबकी मौत निश्चित है। पर इस तालाब के बाशिंदों को तो कोई चिंता ही नहीं है।

अब तो केकड़ा और भी अधिक घबरा गया। उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि तालाब सूख जाने पर उसकी जान कैसे बचेगी। इसलिए उसने बगुले से पुछा तो इसका उपाय क्या है?

बूढ़े बगुले ने कहा इसका कोई अनोखा उपाय नहीं है। उपाय वही है जो दूर-दूर तक अन्य छोटे तालाबों के सारे रहवासी कर रहे हैं। वो अपने परिजनों और मित्रों को लेकर पूर्व दिशा में एक बहुत बड़े पाताली तालाब में जा रहे हैं। उस तालाब में पाताल से पानी आता है इसलिए १२ वर्ष तो क्या २४ वर्षों तक भी अगर पानी न बरसे तो भी वह पाताली तालाब पानी से भरा रहेगा। इस प्रकार दूसरे तालाबों के लोग आपस में इकट्ठे होकर और अपनी शत्रुता को भुला कर अपने लोगों की रक्षा करने में लगे हैं, पर यहाँ तो किसी को कुछ पड़ी ही नहीं है।

बूढ़े बगुले की ऐसी बातें सुनकर केकड़े ने तालाब में जाकर अन्य जीवों को ये बात बताई। देखते ही देखते भयंकर सूखे की यह बात तालाब के पानी में जंगल की आग की तरह फ़ैल गयी। अब तो तालाब में हर जगह बस एक ही बात हो रही थी। ऐसी चिंतापूर्ण बात उस तालाब के जीवों ने पहले कभी नहीं सुनी थी। जिसने भी सुना वो घबरा गया और अपनी जान बचाने के उपाय सोचने लगा।

कुछ जीव तो बहुत ही अधिक घबरा गए और सोचा क्यों न हम चलकर बूढ़े बगुले से ही सही जानकारी ले लें। ऐसा विचार विमर्श कर ये जीव केकड़े के साथ बगुले के पास पहुंचे। बगुले ने उन्हें वही कहानी फिर से सुनाई जो उसने केकड़े को सुनाई थी।

अब कुछ जीव जैसे मछलियाँ और मेंढक तो बहुत ही चिंतित हो गए। उन्होंने कहा हम कैसे किसी दूसरे तालाब में जा सकते हैं। हम तो पानी से ज्यादा दूर भी नहीं जा सकते, मछलियाँ तो पानी से बाहर ज्यादा देर जीवित भी नहीं रह सकती और उनको जमीन पर चलना भी नहीं आता।

इसपर बगुले ने कहा मैं हूँ ना। मेरा सारा जीवन इसी तालाब के सहारे बीता है और जब मैं बूढ़ा हो गया हूँ और इस संसार से विरक्त हो गया हूँ तो मैं भी इस तालाब के रहवासियों का भला कर कुछ पुण्य कमा लेना चाहता हूँ। मैं एक-एक कर तुम लोगों को अपनी पीठ पर बैठाकर पाताली तालाब पहुँचा दूंगा।

अब तो उस तालाब के बहुत से रहवासी बूढ़े बगुले के पास आने लगे और उसे मामा, चाचा, ताया, दादा आदि बोल कर उससे पाताली तालाब पहुँचाने का आग्रह करने लगे।

बूढ़ा बगुला एक-एक कर उन्हें अपनी पीठ पर बैठाकर प्रतिदिन पाताली तालाब के कई चक्कर लगाने लगा।

उसकी योजना सफल हो चुकी थी। वह बेवक़ूफ़ और डरपोक मछलियों और मेंढकों को पाताली तालाब ले जाने के बहाने अपनी पीठ पर बैठाता और कुछ दूर लेजाकर एक चट्टान पर पटक-पटक कर मार डालता और उन्हें खाकर अपना पेट भरता। फिर थोड़ा आराम कर और थोड़ा समय आस-पास ही व्यतीत कर वापस आता और उसके इंतजार में जमा हुए जीवों को पाताली तालाब के मजेदार किस्से सुनाता। और पाताली तालाब में गए मेंढक और मछलियाँ कितने खुश है उन्हें बताता।

इस प्रकार छल-कपट और अपनी बुद्धि के बल पर बूढ़ा बगुला अपना पेट भरने में सफल हो गया। धीरे-धीरे उसका स्वास्थ्य सुधर गया और वो काफी मोटा हो गया।

इधर केकड़े ने जब पाताली तालाब के किस्से सुने तो वो भी वहाँ जाने के बारे में सोचने लगा। और एक दिन वो बूढ़े बगुले के पास आया और उससे बोला बगुला मामा आपके पास सबसे पहले मैं आया था और आप मुझे ही पाताली तालाब लेकर नहीं चल रहे।

केकड़े की बात सुनकर बूढ़े बगुले ने सोचा रोज-रोज वही मछलियाँ और मेंढक खाकर मैं ऊब चुका हूँ, क्यों न आज केकड़े की दावत उड़ाई जाय। ऐसा सोचकर उसने केकड़े को अपनी पीठ पर बैठाया और उस चट्टान की ओर उड़ चला जहाँ उसने मछलियों और मेंढकों को पटक कर मारा था।

केकड़े ने जब एक चट्टान पर हड्डियों का ढेर देखा तो उसने बूढ़े बगुले से पुछा मामा वो सामने उस चट्टान पर हड्डियों का ढेर क्यों लगा हुआ है?

बगुले को केकड़े के भोलेपन पर बहुत हँसी आ रही थी। उसने कहा ये उन मछलियों और मेंढको की हड्डियाँ हैं जिन्हें मैं अपनी पीठ पर बैठाकर लाया था। ऐसा कहकर बूढ़ा बगुला अपनी चालाकी और केकड़े के भोलेपन पर जोर-जोर से हंसने लगा।

अब केकड़ा सारी बात समझ चुका था और उसे अपनी बेवकूफी पर बहु गुस्सा आ रहा था। उसने अपने मजबूत बाजुओं से बगुले की गर्दन पकड़ी और अपने नुकीले दांतों से उसे काट दिया। बूढ़े बगुले की इन्द्रियाँ आज उसकी बुद्धि पर भारी पड़ी थीं, नया स्वाद चखने के चक्कर में आज उसकी इह लीला समाप्त हो गयी।

उधर तालाब पर कई मछलियाँ और मेंढक बूढ़े बगुले का इन्तजार कर रहे थे। हर कोई चाहता था की वह ही बूढ़े बगुले से सबसे पहले मिले ताकि बूढ़ा बगुला उसे पाताली तालाब ले जाये। तभी उन्हें बूढ़े बगुले की गर्दन अपने बाजू में दबाए केकड़ा आता दिखाई पड़ा। केकड़े ने उन्हें बूढ़े बगुले की सारी चाल बतायी।

तालाब के जीव दुख, क्रोध और कृतघ्नता के भावों से भर गए थे। अपने डर पर बहुत शर्मिंदा थे। बगुले के लालच ने ही आज उन सबकी जान बचाई थी।

मित्रों इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है

1. जो काम बल से नहीं हो सकता वो बुद्धि से किया जा सकता है। इसलिए हमें अपनी सफलता के लिए बल और बुद्धि दोनों का प्रयोग करना चाहिए। जिस प्रकार बूढ़ा बगुला अपने बल के कमजोर होने पर अपनी बुद्धि से अपना पेट भरने में सफल हो गया।

2. जब कोई किसी काम को करने की ठान ले और उस काम के लिए जो भी जरूरी हो वो करे तो उसे सफलता अवश्य मिलती है।

3. हमें अपनी इन्द्रियों के वशीभूत होकर अनावश्यक खतरे नहीं लेने चाहिए। जिस प्रकार बगुले ने अपनी जीव्हा के वशीभूत होकर केकड़े के हाथों अपनी जान गवांई।

4. हमें अपने दुश्मनों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। जिस प्रकार मछलियों और मेंढकों ने बूढ़े बगुले पर विश्वास कर अपनी जान गंवाई।

5. हमें डूम्स डे दिखाने वालों यानि प्रलय आने वाली है या बहुत बुरा कुछ होने वाला है ऐसा कहने वालों से सावधान रहना चाहिए।

6. हमें जो खतरे हैं उनसे सदा सावधान रहना चाहिए। अक्सर लोग असावधान हो जाते हैं जिससे दुर्घटना होने की संभावना बढ़ जाती है।

बूढ़े बगुले की हालत तो मरता क्या न करता वाली थी। लेकिन आपको समाज में ऐसे बहुत से लोग मिल जायेंगे जो आपको झूठे डर दिखा कर अपना उल्लू सीधा करते हैं और आपके जान माल का नुकसान करते हैं। क्या आपका भी पाला ऐसे किसी धूर्त और धोकेबाज इंसान से पड़ा है? वह धूर्त पीर, फ़कीर, बाबा, तांत्रिक, ज्योतिषि, डॉक्टर, पुलिस, नेता या अन्य किस पेशे से था? हमें ईमेल या कमेंट के माध्यम से बताएं।

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2 Comments

  1. apki ye kahani mene bachpan me padhi thi or aj padhi h dono hi bar mujhe aise lag rha h jaise pahli bar padh rha hu. ye apki likhne ki kala h ya is kahani ka andaj dono hi bemisal h

    • आपको यह कहानी पसंद आयी ये जानकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई। कमेन्ट करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आपका कुमारजी।

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