बुद्धिमान मछलियाँ और डरपोक मेंढक

आधी रात के समय एक तालाब में सभी जीव शांति से सो रहे थे, लेकिन एकबुद्धि नाम का एक मेंढक बहुत ही बेचैन था। उसकी बेचैनी का कारण शाम की वह घटना थी जिसकी वजह से उसे आज रात ही यह तालाब छोड़ कर किसी दूसरे तालाब में जाना पड़ सकता था। हालांकि उसके दो बहुत ही ख़ास मित्रों ने उसे तालाब न छोड़ कर जाने की सलाह दी थी।

उसके ये दो मित्र शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि नाम की दो बड़ी मछलियाँ थे। अपने नाम की ही तरह शतबुद्धि अगर बुद्धिमान था तो सहस्त्रबुद्धि अति बुद्धिमान। एकबुद्धि की दोस्ती जब से इन दोनों से हुई थी तब से ही उसका समय बहुत अच्छा बीत रहा था। शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि उसे तमाम ज्ञानवर्धक बातें बताते तथा अपनी तरह-तरह की कलाबाजियों तथा करतबों से उसका खूब मनोरंजन करते।

आज शाम को भी एकबुद्धि अपने इन्ही दोनों मित्रों के साथ तालाब के किनारे हँसी-ठिठोली कर रहा था। तभी अपने सर पर मछलियाँ और कंधों पर जाल लादे कुछ मछुआरे तालाब के पास आए और तालाब को बड़े गौर से देखने लगे। कुछ देर तालाब का मुआयना करने के बाद उनमें से एक मछुआरे ने कहा “इस तालाब में बहुत सी मछलियाँ हैं और पानी कम है इसलिए कल सुबह हम सब आयेंगे।“ बस इतना कह कर वे सब चले गए।

मछुआरों की ऐसी बातें सुनकर तीनो मित्र आपस में विचार करने लगे। एकबुद्धि ने कहा “तुम दोनों ने मछुआरों की बात सुनी? अब हमें क्या करना चाहिए? यहाँ रुकना चाहिए या यहाँ से भाग जाना चाहिए?”

यह सुनकर सहस्त्रबुद्धि ने कहा अरे! डरो मत, भला किसी की बात सुनकर भी कोई डरता है। शास्त्रों में कहा है पापियों का कभी भला नहीं होता इसीलिए दुनिया चलती है वरना ये दुनिया कब की ख़त्म हो गयी होती। पहली बात तो ये है कि वे यहाँ आयेंगे नहीं और अगर आ भी गए तो मैं अपनी चालाकी से सबको बचा लूँगा। क्योंकि मैं पानी में तरह-तरह से तैरना और दुश्मन को गच्चा देना जानता हूँ’।

सहस्त्रबुद्धि की ऐसी बातें सुनकर शतबुद्धि बहुत खुश हुआ और बोला, इस दुनिया में एक चतुर के लिए कोई भी चीज असंभव नहीं है। क्योंकि आचार्य चाणक्य ने तो अपनी बुद्धि से ही तलवारधारी नंद वंश के शाशकों का अंत किया था। इसलिए केवल किसी की बात सुनकर ही अपने पुरखों का घर नहीं छोड़ा जा सकता। शास्त्रों में भी कहा है

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

अर्थात् माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं। अरे अपना जन्मस्थान कितना भी खराब हो पर वहाँ जो सुख मिलता है, वह स्वर्ग में भी नहीं मिल सकता।

दोनों की बातें सुनकर एकबुद्धि ने कहा मैं आप दोनों जैसा बुद्धिमान तो नहीं, पर जितना मैं समझता हूँ, इस तालाब को छोड़ देने में ही भलाई है। क्योंकि…

इससे पहले कि एकबुद्धि अपनी बात के पक्ष में कोई तर्क देता शतबुद्धि का पारा चढ़ गया। तुम तो जानते हो कि हम कितने बुद्धिमान हैं। हाँ तुम्हारी बात अलग है, हम ये तो जानते थे कि तुम्हारी बुद्धि कम है पर हमने सोचा भी नहीं था कि तुम इतने डरपोक भी निकलोगे। हम तो यह तालाब छोड़कर जाने वाले नहीं तुम अपना सोच लो, अगर जाना चाहते तो जाओ जल्दी निकलो नहीं तो मछुआरे आ जायेंगे। इतना बोलकर दोनों जोर-जोर से हँसने लगे।

अपने से अधिक बुद्धिमान मित्रों के सामने स्वयं को मूर्ख और डरपोक साबित होते देख एकबुद्धि ने भी उनकी हाँ में हाँ मिला दी। अरे मैं तो बस आप लोगों की राय ले रहा था। मैं भला इतनी सी बात से क्यों डरने लगा। भला अपने इस प्यारे तालाब को छोड़कर मैं क्यों किसी दूसरे तालाब में जाने लगा?

अपने मित्रों के सामने भले ही एकबुद्धि अपने तालाब को न छोड़कर जाने की बात कहकर आया था। लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती जा रही थी उसकी चिंता और डर दोनों ही बढ़ते जा रहे थे। अगर मछुआरों ने कहा है कि वे कल सुबह आयेंगे तो उन्होंने ऐसा क्यों कहा होगा? क्या वे किसी और काम से भी इस तालाब में आ सकते हैं? अगर उन्होंने जाल फेका तो क्या मैं बच पाऊंगा? अगर एक बार बच भी गया तो क्या मैं बार-बार बच पाऊंगा?

एकबुद्धि बहुत प्रयास करने पर भी अपने मित्रों की बातों पर भरोसा नहीं कर पा रहा था।

अगले दिन दोपहर का समय था। एकबुद्धि एक नए तालाब में था जहाँ वह कल रात में ही आया था। यहाँ उसके पुराने तालाब की तरह न कोई मित्र थे और न ही कोई जान पहचान वाला। सुबह से ही एकबुद्धि यहाँ नए-नए लोगों से जान पहचान बनाने में लगा था। लोग उससे बात कर लेते, उसकी व्यथा सुन लेते और फिर सांत्वना देकर अपने काम में लग जाते। पुराने तालाब की तरह यहाँ कुछ भी नहीं था। न शतबुद्धि और शहस्त्रबुद्धि जैसे मित्र थे न ही अन्य जान पहचान वाले।

पुराने तालाब का कोना-कोना वह जानता था पर यहाँ तो हर जगह नयी थी। जहां भी वह डेरा जमाने की कोशिश करता कोई न कोई उस जगह को अपना बता कर उसे वहाँ से हटा देता। अंततः तालाब के बाहर उसे एक शांत स्थान मिला जहाँ रुक कर वह सोचने लगा।

अभी तक तो इधर से कोई मछुआरे जाते दिखाई नहीं दिए। लगता है वो नहीं आए और मैं भय से झूठ में ही अपने तालाब और अपने मित्रों को छोड़कर भाग आया। वे लोग मेरी मूर्खता पर हँस रहे होंगे। अब मैं क्या मुह लेकर उनके सामने जाऊँगा। तभी उसे कल वाले वही मछुआरे दिखाई पड़े जो पुराने तालाब की ओर से ही आ रहे थे। उन्होंने ढेर सारे मछलियाँ मेंढक, केकड़े और अन्य जीव लादे हुए थे। दो मछलियाँ तो इतनी बड़ी थीं कि उनको बाँधकर उन्होंने अपने कंधे पर लटकाया हुआ था।

एकबुद्धि ने उन दोनों बड़ी मछलियों को पहचान लिया था, वे शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि थे। ये तो प्रत्यक्ष था की उन दक्ष मछुआरों के सामने शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि की कोई बुद्धि नहीं चली थी।

उनकी ऐसी दशा देखकर एकबुद्धि को बहुत दुख हुआ। लेकिन अब कल शाम से ही जो चिंता और भय का बोझ था वो उतर गया। उसे अपनी बुद्धि पर भरोसा हो गया था क्योंकि आज सुबह से ही जो मूर्खता और शर्म का भाव था वो आत्मसम्मान और आत्मविश्वास में बदल गया।

उसे अब लगने लगा था कि नए तालाब के लोगों से जल्दी ही उसकी मित्रता हो जायेगी। और वो आराम से यहाँ रह पायेगा। क्योंकि अपने पुराने तालाब को छोड़ कर भागने की जो मूर्खतापूर्ण और दुखभरी कहानी वह यहाँ के लोगों को सुना रहा था वो अब बुद्धिमत्तापूर्ण और सुखद हो चुकी थी।

अब अपनी इस पूरी कहानी को वो इन लोगों को जल्दी से जल्दी सुनाना चाहता था, इसलिए उसने तालाब के पानी में छलांग लगा दी।

तो दोस्तों इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

1. अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग स्किल्स काम आती हैं। मछलियों की जो बुद्धि और तैरने की कला तालाब के जीवों को इम्प्रेस करती थी वो मछुआरों के सामने काम नहीं आयी। इसलिए हमें अपनी स्किल्स और डिग्रियों का घमण्ड नहीं करना चाहिए। और लगातार ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते रहना चाहिए।

2. कोई कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो वह अक्सर परिवर्तन का विरोध करता है और इसके लिए तरह-तरह के तर्क और बहाने ढूंढ लेता है। क्योंकि वह अपने कम्फर्ट जोन में रहना चाहता है। जैसे शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि ने तालाब न छोड़ कर जाने के कई तर्क ढूंढ लिए।

3. कुछ खतरे ऐसे होते हैं जिनसे बचने के लिए आपको मूर्ख और डरपोक साबित होने से भी परहेज नहीं करना चाहिए। स्पेशिअली जहाँ जान जाने का खतरा हो। आजकल लोग अपने आपको बहादुर साबित करने के लिए तरह-तरह के स्टंट करते हैं, खतरनाक जगहों पर सेल्फी लेते हैं, और ब्लू-व्हेल जैसे खतरनाक खेलों में शामिल होते हैं जिसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

इसी प्रकार बहुत से छात्र कक्षा में कुछ समझ में न आने पर शिक्षक से पूछने से डरते हैं कि कहीं उन्हें लोग मूर्ख न समझ लें। ऐसे लोगों की असली मूर्खता तो परीक्षा परिणाम आने पर ही साबित होती है।


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