आपनी धारणाओं को परखें Challenge Your Assumptions

यह बात विश्वकर्मा पूजा के दिन अर्थात १७ सितम्बर २०१५ की है। सुबह करीब ९ बजे अपना रेडिओ बनवाने के लिए मैं बाज़ार गया। रेडिओ बनाने के लिए जिस दुकान को मैं जानता था वो बंद थी। मुझे कुछ और सामान भी खरीदना था इसलिए मैं सामान खरीदने मार्केट में और आगे चला गया।

अचानक मुझे इलेक्ट्रॉनिक्स की एक दुकान दिखाई दी। मैंने सोचा शायद यहाँ पर रेडिओ बनता हो इसलिए मैं दुकान पर गया और पूछा क्या आप रेडियो बनाते हैं? दुकानदार ने कहा नहीं। मैंने पूछा तो आस-पास कोई दुकान बता सकते हो जहाँ रेडियो बनता हो?

उस दुकान पर दो अन्य लोग भी खड़े थे। मेरी अज्ञानता पर उन्हें हँसी आ रही थी। दोनों एक साथ ही बोल पड़े तुम्हारा रेडियो कहीं नहीं बनेगा। क्या तुम जानते नहीं हो आज विश्वकर्मा पूजा है? आगे कई दुकाने हैं जहाँ रेडियो बनता है परन्तु आज कोई भी तुम्हारा रेडियो नहीं बनाएगा। मैंने कहा पर दुकाने तो खुली हैं। इस पर एक ने कहा “दुकानदारों पर यह लागू नहीं होता, उन्हें तो सामान बेचना होता है पर आज कोई भी मिस्त्री काम नहीं करेगा”। मैंने कहा मुझे मालूम है। “मालूम है तो ऐसा बेवकूफी भरा काम ही क्यों करते हो” तुरंत जबाब आया।

मैं उन्हें बताना चाहता था की मैं एक इंजिनियर हूँ और विश्वकर्मा पूजा के बारे में जानता हूँ। पर उसमे से एक आदमी के मुह से शराब की बदबू आ रही थी। मुझे १० बजे वापस घर भी पहुँचना था। मुझे मालूम था की अगर मैं इनसे बहस करूंगा तो कई घंटे यहीं बीत जायेंगे इसलिए मैं वहाँ से चुपचाप निकल गया।

वापस आते समय मैंने देखा की जिस दुकान पर मैं पहले जाना चाहता उसका शटर खुला था और दुकान वाला लड़का बाहर झाड़ू लगा रहा था।
मैंने अपनी बाइक रोकी और उसके पास जाकर बोला मेरा रेडिओ बिगड़ गया है, बनवाना था। उसने पूछा क्या दिक्कत आ रही है? मैंने उसे रेडियो में आने वाली दिक्कतों के बारे में बताया। उसने कहा आज तो विश्वकर्मा पूजा है कोई भी मिस्त्री काम नहीं करेगा। आप अपना रेडियो दे दीजिये कल बन जायेगा। कल आकर ले लीजिये। मैंने उसे रेडियो दे दिया और घर आ गया।

मित्रों दुकान पर खड़े लोगों ने क्या-क्या धारणायें (Assumptions) बना ली थी जरा देखिये
1. मुझे रेडियो आज ही बनवाना था।
2. मुझे विश्वकर्मा पूजा के बारे में मालूम नहीं था।
3. दुकानदार रेडिओ ले कर रख नहीं सकता था।

लेकिन उनकी ये तीनों ही धारणायें गलत थीं।

हम धारणायें कैसे बनाते हैं इसके कुछ उदाहरण देखते हैं

देखकर

किसी ने मैले और फटे कपड़े पहने हैं तो वह गरीब होगा।
कोई महँगी गाड़ी से उतर रहा है तो वह अमीर होगा।

सुनकर

कोई अंग्रेजी बोल रहा है तो वह पढ़ा-लिखा होगा।
कोई देशी भाषा बोल रहा है तो वह अनपढ़ होगा।

दूसरों की बातों से

किसी की सब बुराई कर रहे हैं तो वो बुरा होगा।
किसी की सब बड़ाई कर रहे हैं तो वो अच्छा होगा।

अपने अनुभवों से

किसी के साथ हमारा अनुभव अच्छा नहीं रहा तो वो बुरा होगा।
किसी के साथ हमारी अच्छी मित्रता है तो वो अच्छा होगा।
१०वीं की गणित और विज्ञान आसान है तो ११वीं और १२वीं की भी होगी।

सोचकर

अपने आप ही कुछ सोच कर भी हम धारणायें बना लेते हैं जैसे

यह काम मुझसे नहीं होगा।
कोई मेरी मदद नहीं करेगा।
सब मेरी मदद करेंगे।
मैं परीक्षा में सफल नहीं हो सकता।
यह विषय बहुत आसान है।
यह विषय बहुत कठिन है।

अन्य हजारों तरीकों से

किसी के नाम से उसके स्त्री या पुरुष होने का।
किसी की जात से उसके पेशे का।
किसी के सरनेम से उसके धर्म या क्षेत्र का।
किसी के रंग रूप से उसके क्षेत्र या देश का।
कोई चीज भारी है तो वह मजबूत होगी।
कोई चीज महँगी है तो वो अच्छी होगी।

यह तो बहुत ही छोटी सी लिस्ट है इसी प्रकार की हजारों धारणायें हम रोज बनाते हैं। जिसमें से अधिकतर सही होती हैं पर कुछ गलत भी होती हैं।

मित्रों इससे आप यह सोच रहे होंगे कि हमें कोई भी धारणा नहीं बनानी चाहिए पर ऐसा नहीं है

धारणा एक ज़रूरी बुराई है।

Assumption is a necessary evil.

हमें हर समय धारणायें बनानी पड़ती हैं क्योकि

हमें हमेशा संपूर्ण जानकारी उपलब्ध नहीं होती इसलिए हम चीजों को मान (Assume) कर के चलते हैं।

इसी प्रकार तुरंत निर्णय लेने में भी धारणायें बहुत मददगार होती हैं।

इसीलिए मित्रों धारणायें बनाना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि जानकारी के अभाव में ये हमें एक दिशा देता है। परन्तु हमें अपनी धारणाओं को समय-समय पर परखते रहना चाहिए क्योंकि किसी धारणा के आधार पर जब हम कोई निर्णय ले लेते हैं या कोई कार्य करते हैं और अगर वह धारणा ही गलत निकलती है तो हमारा निर्णय भी गलत हो जाता है और हमारे कार्य के उल्टे परिणाम निकलते हैं।

धारणाओं को कैसे परखें

अधिक से अधिक जानकारी जुटाकर हम अपनी धारणाओं को नए ज्ञान की कसौटी पर परख सकते हैं।

प्रश्न पूछकर भी हम लोगों के बारे में अपनी धारणाओं को परख सकते हैं।

अंत में मित्रों मैं बस इतना ही कहना चाहता हूँ कोई भी निर्णय लेने या कार्य शुरू करने के पहले अपनी उन धारणाओं को जितना हो सके परख लें जिनके आधार पर आप कोई निर्णय ले रहें हैं या कार्य शुरू कर रहे हैं। अच्छा होगा अगर आप उन धारणाओं को यानि जो आप मान कर चल रहे हैं उन्हें लिख लें। इसी प्रकार कार्य शुरू हो जाने के बाद भी समय-समय पर अपनी धारणाओं को उनके महत्व के आधार पर परखें।

 

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